अतिक्रमण,उपेक्षा व भ्रष्टाचार का दंश झेलती हल्दीघाटी

सच है कि रणस्थली महाराणा प्रताप राष्ट्रीय स्मारक सहित समूची हल्दीघाटी के विकास में बाधक तत्वों का कोई अध्ययन नहीं करना चाहता । हल्दीघाटी में भ्रष्टाचार को शिष्टाचार की मोहर लगा कर प्रचारित किया जा रहा है । राष्ट्र की धरोहर प्रताप की रणस्थली हल्दीघाटी के विकास के प्रति स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गांधी एवं स्वर्गीय श्री भेरूसिंह शेखावत जैसी विचारधारा खो सी गई है। बाजारवाद ने हमारे स्वर्णिम इतिहास के मुंह पर करारा तमाचा रख दिया फिर भी किसी भी देशभक्त जनसेवक की सच्ची निष्ठा आज तक नहीं जागी है। वैचारिक नपुसंकता के लिए स्वार्थ को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

भ्रष्टाचार को शिष्टाचार का मुखौटा लगा कर प्रशासन व नेताओं को गुमराह कर सरकारी जमीन हड़पने के प्रयास एक दशक से जारी। ऐतिहासिक स्थल हल्दीघाटी की उपेक्षा को अरसा बीत गया,आज भी कोई धणी धोरी नहीं । सेवानिवृत शिक्षक ने सरकारी योजना में घुस कर राष्ट्रीय स्मारक के नजदीक ही महाराणा प्रताप के नाम पर अपनी निजी दुकान का फीता 2003 में तत्कालीन राज्यपाल से कटवा महाराणा प्रताप के नाम पर हल्दीघाटी में बनने वाले सरकारी संग्रहालय को कागजों में दफ़न कर दिया।

महाराणा प्रताप राष्ट्रीय स्मारक के विकास में संरक्षित चारागाह भूमि को हड़पने की साजिश के तहत पूर्व में निजी व्यापारी द्वारा भूमि को ग्रामीणों को बरगला कर बिलानाम कराया। बिलानाम भूमि पर अवैध कब्जा कर राजनैतिक पूंजीवादी सांठगांठ से 5 बीघा आवंटन कौड़ियों में कराया । अब नाले को मूँद कर घोड़े की मूर्ति लगाने का दिखावा कर बढ़ाया जा रहा है।
 
भारत सरकार द्वारा समय समय पर ग्रामीण पर्यटन को बढावा देने के उद्देश्य से योजनाएॅ चलाई जाती हैं परन्तु अफसोस की बात यह है कि योजनाओं की जानकारी आम व्यक्ति तक सम्पूर्ण रुप से नही पहुॅच पाती हैं । गत वर्ष केंद्रीय मंत्री की मौजूदगी में राज्य स्तरीय प्रताप जयंती के आयोजन से हल्दीघाटी के विकास की आस जागी थी।राष्ट्रीय स्मारक की आरक्षित भूमि पर नाले को मूंद कर किये गए अतिक्रमण से पूंजीवादी ताकतों के चेहरे सामने आने लगे है।
 
राजसमन्द जिले के ग्रामीण पर्यटन के क्षेत्र में महाराणा प्रताप के जन्मस्थल कुम्भलगढ़, रणभूमि हल्दीघाटी एवं मृण कला केन्द्र मोलेला में सैलानीयों का आकर्षण बढाने के उद्देश्य से सन् 2001 में उदयपुर के दरबार हाल व शिल्प ग्राम में अंतरराष्ट्रीय स्तर का ‘‘ भारत में ग्रामीण पर्यटन ’’ विषय पर पर्यटन मंत्रालय व उदयपुर चेम्बर आॅफ काॅमर्स एंड इण्डस्ट्री के सहयोग से संगोष्ठी एवं प्रदर्शनी का आयोजन भी किया गया जिसके तहत कुम्भलगढ़, हल्दीघाटी आदि स्थलों का कई विशिष्ट जनों द्वारा भ्रमण भी किया गया।
16 वर्ष बाद आज इन स्थलों पर नजर डाले तो सबसे बडी विफलता हल्दीघाटी व मोलेला क्षैत्र में देखी जा सकती हैं, जहाॅ पर्यटकों को जानकारी देने के लिये पर्यटन विभाग के प्रयास नाकाफी है । केंद्रीय पर्यटन मंत्री,महामहिम राज्यपाल की  हल्दीघाटी यात्रा के दौरान भी वस्तुस्तिथि से अवगत कराया गया था नतीजे सिफर रहे। पर्यटक यहाँ रक्त तलाई से राष्ट्रीय स्मारक तक सूचना पटट् पर उपलब्ध जानकारी पर ही निर्भर हैं। चेतक गेस्ट हाउस बंद है तो राष्ट्रीय स्मारक का संचालन 2009 से ही पूंजीपतियों के संस्थान में निजी स्वार्थ से बाधित है।  इतिहास की जानकारी सरकारी स्तर पर उपलब्ध नहीं होकर निजी व्यापारी की दुकान बन गई है।
सरकारी उपेक्षा के चलते पर्यटक महाराणा प्रताप के युद्ध स्थल की वास्तविकता से महरुम हो बलीचा में चल रहे व्यावसायिक प्रदर्शन केंद्र में अपने को ठगा सा महसूस कर रहा हैं । मोलेला जैसे विश्व विख्यात मूर्तीकला के केन्द्रो तक आम पर्यटक नही पहुच पा रहा हैं जिससे सरकार की कथनी व करनी में अन्तर स्पष्ट नजर आ रहा हैं।
उल्लेखनीय है हल्दीघाटी आने वाले पर्यटक खमनोर बस स्टैण्ड पर खडे राहगीरो से सवाल पूछते है कि हल्दीघाटी किधर हैं तो एक ही जवाब उन्हे मिलता हैं कि तीन किलोमीटर आगे हैं । पर्यटको को राह दिखाने वाले शख्स हल्दीघाटी रणक्षैत्र के छह किलोमीटर में फैला होने व ‘‘ रक्त तलाई ’’ जहाॅ महाराणा प्रताप का मुगल सेना के साथ घमासान हुआ था उसके बारे में कोई जानकारी नही दे पाते हैं ,जिससे मूल स्थल पर आकर भी पर्यटक बलीचा में संचालित निजी मूर्तियों की दुकान में 100 रुपये दे जानकारीयों को प्राप्त कर लौट जाता हैं। ग्रामीण पर्यटन की रक्त तलाई,शाहीबाग, मूल दर्रे सहित स्मारक के नजदीक बढ़ती रोजगार की सम्भावनाओं को देख वर्तमान में आवश्यकता क्षैत्रिय महत्व को स्वीकार कर ,जनता की  जागरुकता पर निर्भर हैं।
महाराणा प्रताप जयंती समारोह हर जगह धूमधाम से मनाया जायेगा। खूब सारे फ़ोटो खिंचवाए जायेंगे। समारोह में बड़ी बड़ी आदर्शवादी स्वाभिमानी बातें कही जायेगी। नतीजे सामने है…आजादी के बरसों बाद भी भारत के प्रथम स्वतंत्रता सैनानी प्रातःस्मरणीय महाराणा प्रताप को पहचान दिलाने वाली धरोहर हल्दीघाटी में जयंती समारोह महज औपचारिक व स्थानीय मनोरंजन का साधन बन गया है। राष्ट्रीय स्तर पर महाराणा प्रताप राष्ट्रीय स्मारक ,चेतक समाधी से रक्त तलाई तक फैली हल्दीघाटी की पावन धरा विकास व पर्यटन से दूर है। 18 जून हल्दीघाटी युद्ध तिथि पर दीपंजलि का आयोजन जारी है। आज नहीं तो कल सरकार इस रणधरा पर चल रहे भ्रष्टाचार को मिटायेगी।
हल्दीघाटी पर्यटन समिति का कहना है कि पुरातत्व महत्त्व के स्थलों ,कला, संस्कृति का संरक्षण होने के साथ ही पर्यटन विभाग को भी अपनी जिम्मेदारीयों को ईमानदारी से निभाना होगा जिससे भारत में ग्रामीण पर्यटन के क्षैत्र में बनने वाली योजनाओं की जानकारी आम ग्रामीणों तक उपलब्ध हो व हल्दीघाटी आने वाले पर्यटकों के साथ न्याय हो सके ।युद्धस्थल पर युद्धतिथि के आयोजन को महत्त्व मिलना चाहिये।