प्रातः स्मरणीय महाराणा प्रताप की 477वीं जयंती पर हार्दिक शुभकामनाएं

प्रातः स्मरणीय महाराणा प्रताप का जीवन परिचय 


मेवाड़ के महान सपूत प्रातःस्मरणीय, वीर शिरोमणी महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया का जन्म जेठ सुदी तृतीया, विक्रम सम्वत् 1597-दिनांक 9 मई, 1540 रविवार को राजसमन्द जिले की दुर्गम पहाड़ियो में स्थित ऐतिहासिक दुर्ग कुम्भलगढ़ में महाराणा उदयसिंह की रानी जयवन्ती बाई सोनगरा की कोख से हुआ। इनका बचपन किलेदार आशा शाह की देख रेख में कुम्भलगढ़ में व्यतीत हुआ।

महाराणा उदयसिंह अपनी दस रानियों में अतिप्रिय रानी धारबाई भटयाणी के पुत्र जगमाल को मेवाड़ का शासन सौंपते हुए सन् 1572 में स्वर्गवासी हो गये। उस समय प्रताप ने ज्येष्ठ़ पुत्र होकर भी इसका विरोध न कर अपने अच्छे संस्कारो का परिचय दिया । लेकिन वफादार मेवाड़ी सरदारों व मंत्रियों ने जगमाल को अयोग्य घोषित कर फाल्गुन सुदी 15,विक्रम सम्वत् 1628 – दिनांक 28 फरवरी,1572 को ही गोगुन्दा में महाराणा प्रताप का राजतिलक कर दिया।
राजतिलक के मात्र चार वर्ष पश्चात मुगल सम्राट अकबर के मेवाड़ पर आधिपत्य करने की योजना के चलते मुगलों द्वारा कुम्भलगढ़ पर 3 अप्रेल 1576 को आक्रमण कर अधिकार कर लिया गया । जिससे आहत हो महाराणा प्रताप ने प्रतिज्ञा लेकर अपने विश्वासपात्र सैनिको के साथ जंगलो में रहकर दुश्मनों को लोहे के चने चबवाना आरम्भ कर दिया ।

मेवाड़ पर आक्रमण हेतु मुगल सेनापति आमेर के राजा मान सिंह के नेतृत्व में निकली शाही सेना का सामना 18 जून 1576 को खमनोर गाँव से कुछ दूर एक तंग पहाड़ी दर्रेे में मेवाड़ के सपूत महाराणा प्रताप से हो गया। भीषण रक्तपात मचा व दुश्मनों को मुहँ की खानी पड़ी । मात्र चन्द घण्टों तक चले इस संग्राम से हल्दीघाटी का मुख्य रणक्षैत्र जो खमनोर में रक्त तलाई के नाम से पहचाना जाता है वह रक्त की एक ताल में बदल गया ।


संघर्षरत रहते हुए महाराणा प्रताप ने पुनः सितम्बर 1576 में गोगुन्दा पर अधिकार कर लिया व सन् 1586 में मांडलगढ़ एवं चितौड़गढ़ को छोडकर समूचे मेवाड़ राज्य पर पुनः विजय हासिल कर अपने शौर्य का लोहा मनवाया । माघ सुदी 11, विक्रम सम्वत् 1656 – दिनांक 19 जनवरी,1597 को 57 वर्ष आयु में चावण्ड़ गांव में स्वतन्त्रता के पुजारी महाराणा प्रताप ने आखिरी श्वास ली।

आदर्श महाराणा प्रताप ने जो प्रतिज्ञा ली उसे पूरी कर ही दम लिया – युवाओं को प्रताप से प्रेरणा लेने की आवश्यकता है ।

“ प्रताप प्रतिज्ञा “

जब तक मैं शत्रुओं से अपनी पावन मातृभूमि को मुक्त नही करा लेता, तब तक न तो मैं महलों में रहूंगा, न शैय्या पर सोंऊगा और न सोने चांदी अथवा किसी धातु के पात्र में भोजन करुंगा । वृक्षों की छांव ही मेरे महल, घास ही मेरा बिछौना और पत्ते ही मेरे भोजन करने के पात्र होगें ।