भारतवर्ष में मेवाड़ के महान सपूत प्रातःस्मरणीय, वीर शिरोमणी महाराणा प्रताप का नाम मातृभूमि के अमर सैनानी के रूप में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। हल्दीघाटी का जनयुद्ध इतिहास का वह स्वर्णिम अध्याय है, जिसके स्मरण मात्र से भारतीय पराधीनता के कालचक्र में कई देश भक्तों को प्रेरणा मिली और वे देश हितार्थ शहीद हो गये।
मेवाड़ पर मुगल आक्रमण के समय स्वाधीनता को बचाये रखते हुए मातृभूमि की वेदी पर महाराणा प्रताप द्वारा आयोजित इस पावन यज्ञ में हाकिम खाँन सूरी जैसे पठानी लड़ाके ने सेना की कमान सम्भालते हुए अपने प्राणों को न्यौछावर कर साम्प्रदायिक एकता का परिचय दिया, झाला मान सिंह, भीलू राणा, ग्वालियर नरेश रामशाह तँवर, भामाशाह सहित कई अगणित यौद्धाओं ने मेवाड़ की आन, बान, शान के खातिर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया, मूक अश्व चेतक ने अपने प्राणों की आहुति देकर स्वामी भक्ति का अनुपम उदारहण प्रस्तुत किया। विश्व प्रसिद्ध युद्धस्थली हल्दीघाटी सभी स्वतन्त्रता प्रेमियों के लिये अमर तीर्थ हैं।
अरावली पर्वतमाला की गोद में स्थित हल्दीघाटी मेवाड़ का विश्व प्रसिद्ध रणक्षेत्र है। स्वतन्त्रता प्रेमियों के लिए अजर अमर प्रेरणा की स्त्रोत यह रणभूमि, जिसकी तीर्थ यात्रा कर स्वतन्त्रता के पुजारियों का मस्तक महाराणा प्रताप और उनके स्वामी भक्त अश्व चेतक सहित मेवाड़ी सेना में भाग लेने वाले शूरमाओं एवं आदिवासीयों ( भीलों ) के प्रति श्रद्धा से अवनत हो उठता हैं। ऐसे इतिहास प्रसिद्ध हल्दीघाटी का शौर्य पूर्ण संग्राम जो कि भारतीय इतिहास में स्वर्णांक्षरों मे अंकित है और आज भी सूरमाओं की प्रेरणाओं का अमर स्त्रोत हैं।
भारत की आजादी के बाद भारत सरकार ने 21 जून 1976 को शौर्य-युग का स्मरण करते हुए हल्दीघाटी युद्ध की चतुःशती समारोह का आयोजन हल्दीघाटी में किया था। इस अवसर पर तत्कालिन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी द्वारा चेतक समाधी के सामने बने राजस्थान राज्य पर्यटन विकास निगम के मोटल पर विभिन्न राजमहलों से एकत्रित हल्दीघाटीकालिन अस्त्र शस्त्रों की प्रदर्शनी का उद्घाटन कर अवलोकन किया गया व बादशाह बाग में आयोजित समारोह जिसमें लगभग 1 लाख जनता एकत्रित हुई थी, उसे सम्बोधित कर महाराणा प्रताप के शौर्य, त्याग, बलिदान, निष्ठा और स्वाभिमान की याद दिलाते हुए राष्ट्रीय एकता की बात दोहराई व महाराणा प्रताप से जुड़े स्थलों के विकास हेतु मेवाड़ काॅम्पलेक्स योजना की घोषणा की, उस समय का दृश्य देख हल्दीघाटी युद्ध की याद में उपस्थित प्रत्येक प्राणी में राष्ट्र प्रेम की भावना जाग्रत हो उठी ।
मेवाड़ के महान सपूत प्रातःस्मरणीय, वीर शिरोमणी महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया का जन्म जेठ सुदी तृतीया, विक्रम सम्वत् 1597-दिनांक 9 मई, 1540 रविवार को राजसमन्द जिले की दुर्गम पहाड़ियों में स्थित ऐतिहासिक दुर्ग कुम्भलगढ़ में महाराणा उदयसिंह की रानी जयवन्ती बाई सोनगरा की कोख से हुआ। इनका बचपन किलेदार आशा शाह की देख रेख में कुम्भलगढ़ में व्यतीत हुआ।
हल्दीघाटी
”“ जब तक मैं शत्रुओं से अपनी पावन मातृभूमि को मुक्त नही करा लेता, तब तक न तो मैं महलों में रहूंगा, न शैय्या पर सोऊंगा और न सोने चांदी अथवा किसी धातु के पात्र में भोजन करुंगा । वृक्षों की छांव ही मेरे महल, घास ही मेरा बिछौना और पत्ते ही मेरे भोजन करने के पात्र होगें । ”” - प्रताप प्रतिज्ञा