भारतवर्ष में मेवाड़ के महान सपूत प्रातःस्मरणीय, वीर शिरोमणी महाराणा प्रताप का नाम मातृभूमि के अमर सैनानी के रूप में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। हल्दीघाटी का जनयुद्ध इतिहास का वह स्वर्णिम अध्याय है, जिसके स्मरण मात्र से भारतीय पराधीनता के कालचक्र में कई देश भक्तों को प्रेरणा मिली। मेवाड़ पर मुगल आक्रमण के समय स्वाधीनता को बचाये रखते हुए मातृभूमि की वेदी पर महाराणा प्रताप द्वारा आयोजित इस पावन यज्ञ में हाकिम खाँन सूरी, झाला मान सिंह, भीलू राणा, ग्वालियर नरेश रामशाह तँवर, भामाशाह सहित अगणित यौद्धाओं ने मेवाड़ की आन, बान, शान के खातिर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। मूक अश्व चेतक ने अपने प्राणों की आहुति देकर स्वामी भक्ति का अनुपम उदारहण प्रस्तुत किया।
अरावली पर्वतमाला की गोद में स्थित हल्दीघाटी मेवाड़ का विश्व प्रसिद्ध रणक्षेत्र है। स्वतन्त्रता प्रेमियों के लिए अजर अमर प्रेरणा की स्त्रोत यह रणभूमि, जिसकी तीर्थ यात्रा कर स्वतन्त्रता के पुजारियों का मस्तक महाराणा प्रताप और उनके स्वामी भक्त अश्व चेतक सहित मेवाड़ी सेना में भाग लेने वाले शूरमाओं एवं आदिवासीयों (भीलों) के प्रति श्रद्धा से अवनत हो उठता हैं।