ऐतिहासिक परिचय :-नाथद्वारा

महाप्रभु श्री वल्लभाचार्यजी के परम आराध्य बृज जनों के प्रिय श्रीनाथजी के विग्रह की सुरक्षा करना उनके वंशज गोस्वामी बालकों  का प्रथम कर्तव्य था। इस दृष्टि से श्री विट्ठलनाथजी के पौत्र श्री दामोदर जी स्वयं अपने काका गोविन्दजी, बालकृष्णजी एवं श्री वल्लभजी ने श्रीनाथजी के विग्रह को प्रभु आज्ञा से बृज छोड देना उचित समझा ओैर समस्त धन इत्यादि को वहीं छोडकर एक माह तक अपने प्रिय श्रीनाथजी को लेकर वि.स. 1726 आश्विन शुक्ला 15 शुक्रवार को रात्रि  के पिछले प्रहर रथ में पधारकर बृज से प्रस्थान किया।अन्त में मेवाड़ राज्य के सिंहाड नामक स्थान पहुंचकर स्थायी रूप से विराजमान हुए।उस काल में  मेवाड़ के राजा राजसिंह सर्वाधिक शक्तिशाली हिन्दु नरेश थे। इन्होंने औरंगजेब की उपेक्षा कर पुष्टि सम्प्रदाय के गोस्वामियों को आश्रय और संरक्षण प्रदान किया। संवत 1728 कार्तिक माह में श्रीनाथजी सिंहाड पहुंचे वहां मन्दिर बन जाने पर फाल्गुन कृष्ण सप्तमी शनिवार को उनका पाटोत्सव किया गया।
श्रीनाथजी के कारण मेवाड़ का वह अप्रसिद्ध ग्राम सिंहाड अब भी श्री नाथद्वारा नाम से भारत में ही नहीं विश्व में सुविख्यात है। सेवा भावना के विशेष रूप को प्राणान्वित किया। उन्होंने अपने अष्ट छाप के भक्त को अष्टयाम दर्शनों के लिये कीर्तन की सेवा प्रदान की। श्री गुंसाईजी के जीवन काल में श्रीनाथजी के अष्टयाम सेवा भावना का क्रम उत्तरोत्तर बढता ही गया। तदनुसार छः वर्ष घसियार वास करने के बाद वि.सं. 1864 में भगवान श्रीनाथजी अपने दल बल सहित अनेक भक्तों के साथ युद्ध भूमि हल्दीघाटी के बीहड़ रास्ते से खमनोर होते हुए पुनः नाथद्वारा पधारे। तब से घसियार में आज भी चित्र जी की सेवा होती है। मनोरथ उत्सव होते हैं। नाथद्वारा मन्दिर की वहां प्रतिकृति है। तत्कालीन समय में यह क्षेत्र मेवाड रियासत के अन्तर्गत था।
मेवाड के शासक महाराणा राज सिंह (उदयपुर) ने श्रीनाथजी की सुरक्षा के लिये चार दीवारी के साथ सैनिक तैनात किये। सुरक्षा के कठोर सुप्रबंध के कारण यह नगरी कालान्तर में विकसित होती रही।
नाथद्वारा नगर भारत के प्रमुख वैष्णव केन्द्रों में से एक है, इसमें प्रमुख मन्दिर भगवान श्री कृष्ण का है। जो श्रीनाथजी के नाम से प्रसिद्ध है। यहां पर वर्ष भर देश व विदेशों से श्रद्धालु दर्शनों  के लिये आते हैं।
भारत वर्ष में मेवाड़ तीर्थ स्थलों के साथ ऐतिहासिक शौर्य की गाथाओं से भरा पडा है। अरावली की सुरम्य घाटीयों की परिधि से लगी ‘ राजस्थान की थर्मोपल्ली ‘ महाराणा प्रताप की रण स्थली हल्दीघाटी नाथद्वारा से 16 किमी दूर है।मन्दिर के बढते कार्यकलापों को देखते हुए राज्य सरकार द्वारा स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात प्रबंधन एवं संचालान हेतु नाथद्वारा मन्दिर एक्ट 1959 जारी कर मन्दिर मण्डल की स्थापना की गई। प्रशासनिक व्यवस्था हेतु मुख्य निष्पादन अधिकारी नियुक्त किया गया। नाथद्वारा मण्डल के अधीन यात्रीयों की सुविधा हेतु 14 धर्मशालाओं का निर्माण कराया गया। साथ में अन्य सुविधाऐं भी उपलब्ध करवायी गई।